Monday, 17 April 2017

पिछले दिनों एक फ्रेंड रिक्वेस्ट ने मुझे इस गज़ल की याद दिलायी और पोस्ट करने को प्रेरित किया, क्योंकि उसमे मित्रता और रिश्ते का मेल था, जबकि ये दोनों अलग -अलग हैं। हर रिश्तेको किसी न  किसी नामकी जरुरत पड़ती ही है किन्तु मित्रता को किसी नाम की जरुरत ही नहीं है। संक्षिप्त में कहूँ तो एक मूर्त रूप से अमूर्त हो जाता है तो दूसरा अमूर्त में मूर्त रूप को देखता है। 
यद्यपि यह गज़ल मेरी लिखी नहीं है। यह ८० के दशक में यूनियन बैंक वाराणसी की पत्रिका में छपी थी ,,,,,,जो मेरी पढ़ी हुई है ------
तुम्हारी शपथ मै तुम्हारा नहीं हूँ 
भटकती लहर का किनारा नहींहूँ। 
तुम्हारा ही क्यों, मै किसी का नहीं हूँ 
रहेगा ग़म अंततक इसीका 
किया एक अपराध मैंने जगत का 
न था जिसका हुआ मै उसीका 
आगेकी तो मै नहीं जानता हूँ 
अभी तक मै किसीका प्यारा नहीं हूँ 
तुम्हारी शपथ मै तुम्हारा नहीं हूँ ,,,| 

किसीको कुछ न देसकी चाह मेरी 
प्रलय भी न लेसकी थाह मेरी 
किसीके चरण - चिन्ह मैंने न खोजे 
जिधर पैर पड़ गये बन गयी राह मेरी 
न जाने कहांसे कहां पहुँच गया हूँ 
निश्चित पथिक हूँ ,सहारा नहीं हूँ 
तुम्हारी शपथ मै तुम्हारा नहीं हूँ ,,,,,
भटकती लहर का किनारा नहीं हूँ।।

Monday, 20 March 2017

अगले ही हफ्ते २८ मार्च २०१७ को चैत्र शु ० प्रतिपदा "गुडी पाडवा "है । नया वर्ष, नवीन संवत्सर का प्रारम्भ । जो जानते  है और मानते हैं वे सभी इसका स्वागत करेंगे ही । मेरा भी वही एक प्रयास काव्य के माध्यमसे ----                                       ---नववर्षाभिनंदन---
                                          इस धरती को करदे नंदन,
                                          नया वर्ष तेरा अभिनन्दन । 
नयी ज्योतिदे शुभद कामना  
हो प्रशस्तपथ राष्ट्र चिंतना  ।  
                                       अरुणोदय का हो अभिवंदन 
                                         नया वर्ष तेरा अभिनन्दन । 
अंधकार को हर हरि मन के 
हर्षित कर हर क्षण जीवन के 
                                            टूटे कोई अब ना  कंगन 
                                            नया वर्ष तेरा अभिनन्दन । 
प्रेम भरा हो जन का जीवन 
रहे अखण्ड सदा निराञ्जन
                                          तन-मन महक उठे बन चन्दन 
                                           नया वर्ष तेरा अभिनन्दन  । । 
                                                ***** वासुदेव चिं० महाडकर 

Monday, 6 March 2017

बचपन की यादें  ,जिन्होंने होली पर लिखने के लिए प्रेरित किया, वर्ना अब कहाँ होली और होली के वो रंग -??---
                        ==आओ! खेलें हम तुम  संग ==    
                                             लायी होली फिरसे रंग ,
                                            आओ! खेलें हम तुम संग 
लाल गुलाबी हरा बसंती ,
इंद्रधनुष-सी धरा की कान्ति,  
                                              नर नारी  में भरी उमंग   
                                              आओ ! खेलें हम तुम संग 
                                              लायी होली फिर से रंग । 
यह भीग रहा है पूरा तन 
हर्षोल्लास से भरा है मन ,  
                                             छोड़ द्वेष मिलने दो अंग । 
अबीर गुलाल का उठा धुआं 
धुंधलाता है सारा जहाँ।,     
                                             देख इसे सब रहगए दंग ।
 यह मौसम भी है सजा -सजा 
बस पीने का है आज मजा 
                                            हर -हर बोलो, औ पियो भंग    
                                            आओ !खेलें  हम तुम संग 
                                            लायी होली फिर से रंग ।    
                                              ____ वासुदेव चिं महाडकर 

Thursday, 2 March 2017

क्षितिज के पार -----  
                क्षितिज के  पार
                एक अंजाना विस्फोट
                आश्चर्य से लोगोने देखा  
                कुछ ही क्षणों बाद / पहचानते हुए
                किसी वृद्ध ने कहा -
                "यह तो सूर्य है "
               वसुंधरा को भी / ऊर्जा देने वाला
                प्रतिक्षण / क्रमिक विकास
                यह स्वयं करेगा
                और कुछ ही घंटो में
                 पूर्ण प्रौढ़ हो जायेगा
                तब इसके तेज मात्र से
                कितने ही जीव  /  अशांत हो
                आत्मोत्सर्ग करेंगे ।
                ज्येष्ठ माह में  /  तब भी -
                किसी मुंडेर पर / बैठा होगा
                मात्र कबूतर -------
                शांति का सन्देश देता हुआ ।
                 किन्तु सूर्य की / विशेषता है
                प्रौढ़ता के बाद -
               यह तेज को / स्वयं ही हरेगा
               धीरे ----धीरे,,,,
              असंख्य किरणपुंज  
              अपनेआप में समेटता हुआ
              संध्याकाल में  / मौन
              मात्र प्रतीत होगा ।
               फिर कुछ ही समय बाद -
              अस्तमान से पहले ,
              क्षितिज पर छोड़ देगा  / प्रतिबिम्ब
               चन्द्रमा के रुप में ------  ।  
                    ______ वासुदेव चिं महाडकर 

Thursday, 23 February 2017

__      -महिमा महादेव की न्यारी -
                                     महिमा महादेव की न्यारी
                                     गाता  "वासू" बने  पुजारी। 
जटा -जूट जो मस्तक धारी
नन्दी पर   वह करे सवारी 
वाम भाग है जिसका नारी 
जड़-जीवोंका वह हितकारी 
                                      कितनी सुन्दर प्रतिमा प्यारी 
                                      महिमा  महादेव  की  न्यारी  
सर्पों को  जिसने है पाला
 रूद्राक्षों की पहने माला
अधरों पर हो विष का प्याला 
वह  देवों मे देव निराला 
                                      उससे ही गङ्गा अवतारी  ।
जो डमरू की डम-डम ध्वनि पर
प्रचण्ड ताण्डव नृत्य कर सके 
धक्-धक् जलती हुई अग्नि मे 
कामदेव को हवन कर सके । 
                                       है वह शङ्कर प्रलयंकारी । 
श्वेत वस्त्र है जिसको प्यारा 
स्तुति करते ही देत सहारा 
देवों  में उस  महादेव  को   
हृदय करे शत -नमन हमारा 
[आज महाशिवरात्री के दिन 
उस शिव को शत नमन हमारा ]
                                           चिता -भस्म वह त्रिपुण्ड धारी 
                                                 महिमा महादेव की न्यारी 
                                                  गाता "वासू' बने   पुजारी। 
                              _______वासुदेव चिन्तामणि महाडकर 
                                           
   
  

Monday, 20 February 2017

                                                        श्रद्धवान लभते ज्ञानम्                                                                               कोई भी कार्य श्रद्धा से करे तो वह ज्ञान प्राप्ति मे कारण बनता है और वह श्रद्धावान ज्ञानी होता है |यह श्रद्धा अन्ध श्रद्धा हो तो भी चलेगी या वह तर्क संगत होनी ही चाहिये इसका निर्णय करना थोडा साहस का कार्य होगा ,क्योकि अन्ध श्रद्धा से भी संत ज्ञान के अधिकारी हुए ,यह बात प्रसिद्ध ही है |किसी समय ऐसा भी होता है कि चिकिस्सा [तर्क संगति ] करते हुए श्रद्धा डगमगा ने लगती है और  ऐसा ही कुछ प्रकार सत्यनारायण व्रत के विषय मे मेरा हुआ | बचपन से कई बार सत्यनारायण की कथा सुनी और ऐसी श्रद्धा भी थी कि स्कन्द पुराण के रेवा खण्ड मे इसका विधान है किन्तु ब्रह्मिभूत नारायण महाराज केडगावकर इनके यहा जब अहोरात्र {अखण्ड }सत्यनारायण सप्ताह हुआ उस समय वैकुण्ठवासी नागेशशास्त्री उप्पिनबेटगिरी जी ने इस व्रत की प्रामाणिकता बताते हुए ऐसा विधान किया कि -भलेही विद्यमान रेवाखण्ड मे सत्यनारायण व्रत दिखता न भी हो तो भी लुप्त होगये भाग मे वह है |इसे सुनने के बाद मन मे सन्देह उत्पन्न होकर विद्यमान रेवाखण्ड मे दुसरे कुछ और व्रतो का विधान है कि क्या ? इसे जानने की जिज्ञासा हुई |उसके बाद काफी दीनो तक पुस्तक ही उपलब्ध नही हुई | आगे परम् पूज्य  काणे महाराज जी के यहा 18पुराणोके प्रवचन के समय उपर्युक्त जिज्ञासा का समाधान प्राप्त होगा ,यह सोचकर आनन्द हुआ |  किन्तु क्रमप्राप्त स्कन्द पुराण के रेवाखण्ड के प्रवचन के बाद वह अस्तन्गत हुआ क्योकि रेवा अर्थात नर्मदा और उसके वर्णन का खण्ड, जिसमे किसीभी व्रतका विधान नही था ; इसलिये प्रचलित सत्यनारायण व्रत को प्रमाण नही मिला | संयोग से हुआ यह कि पुराण समाप्ति के बाद परम् पूज्य  काणे महाराज जी के यहा सत्यनारायण पूजा के समय कथा बताने की मुझे अाज्ञा हुई | देखता हू तो प्रत्यक्ष भविष्य पुराण के कुछ पृष्ठ वहा व्यासपीठ पर रखे हुए थे  उसे देखकर प्रसन्नता हुई | अब सारी संगति जुडचुकी थी कि भविष्य पुराण के विधान को किसीने सामान्य रुपान्तरण करके प्रमाणिक्ता के लिये उसे स्कन्दपुराण से जोड दिया | उसी समय मनमे फिर दुसरी चिन्ता सताने लगी कि यह प्रामाणिक कथा छपकर लोगो के सामने आनी चाहिये | किन्तु यह मेरे लिये असंभव था | आगे कभी स्कन्द पुराण की कथा पढने के समय मनमे दुःख होकर , " सत्यनारायण जी !आपकी वह सत्यकथा लोगोंके सामने लाइये " ऐसे बोल रिह्दय में समय -समय पर निकलनेसे ही [समष्टिभूत ] सत्यनारायण स्वरुपी ब्रह्मचैतन्य स्वामी महाराज जी ने अपने एकनिष्ट भक्त परमपूज्य काणे महाराज जी को प्रेरित किया और उसी प्रेरणा के फलस्वरुप यह प्रामाणिक सत्यकथा परमपूज्य काणे महाराज सत्यनारायण भक्तोंको सादर प्रस्तुत कर रहे हैं । इसीलिए प,पू ,काणे महाराज प्रेरक श्री १ ० ८ ब्रह्मचैतन्यमूर्ति स्वामी महाराज एवं सर्वान्तरयामी तथा सर्वनियंता सत्यनारायण इन सबको शतशः प्रणाम करके यह निवेदन पूर्ण कर रहा हूँ। 
                                                                                                            -   केशव श्रीधर करंबेळकर   
                                                                 मराठी से हिन्दी अनुवाद _ वासुदेव चिन्तामणि महाडकर 
मुंबई- आषाढ़ शु ० ११ -१८८३ सोमवार 
दिनांक २४ /७ /६१  














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Sunday, 19 February 2017

आज हर हिन्दु परिवारमे सत्यनारायण पूजा होती है | किन्तु बहुत कम लोग यह जानते है  कि यह पूजा-कथा  स्कन्द पुराण मे न होकर भविष्य पुराण मे है |वर्तमान कथा भाग मे भी कुछ् अन्तर है | परम् पूज्य काणे महाराज जी ने इस प्रामाणिक कथा को  पुस्तक रुप मे प्रकाशित भी किया किन्तु इसका प्रचार हो नही  पाया | कथा मे संशोधन कर स्कन्द पुराण से जोडने के पिछे क्या कारण होगा यह तो पता नही, पर कहा ये जाता है कि कलियुगमे केवल एक ही व्रत सत्यनारयन व्रत ऐसा है जो इसी जीवन मे फल देता है | फिर इतने महत्वपूर्ण व्रत कथा की प्रामाणिकता मे परिवर्तन क्यो ???