Thursday, 14 September 2017

1 9 9 6 में लिखी ये मेरी कविता हिंदी दिवस की शुभकामनाओं के साथ  --
                                                -ः दिवाकर ः-
                     नित्य दिवाकर आता उसकी थी बस एक समस्या ।
                     वर्ष नहीं, कुछ युग - युग बते करता रहा तपस्या ।।

                      हौले -हौले जब भी आता रजनी भागखडी होती। 
                      बन जोगी वह दिनभर ढूंढे ,जाने कहां थी वह सोती  ।।

                      कठिन तपस्या देख नित्य की , उठे स्वयं भगवान तभी ।
                     रजनी से मिलकर कह डाली युग- युग बात सभी।

                     सुनकर बात प्रभू की रजनी, सोच- सोच फिर द्रवित हुई।
                     अश्रु बहाती रजनी दिवाकर में यूं आज विलीन हुई ।।
                                                                वासुदेव महाडकर-

Tuesday, 12 September 2017

                        - सद् बुद्धि और दुर्बुद्धि एक चिंतन -

               सद् बुद्धि और दुर्बुद्धि जैसे शब्दों का प्रयोग हम सभी अपने अपने व्यवहार में हमेशा ही करते हैऔर यही समझते हैकि सद् बुद्धि का अर्थ हैअच्छी बुद्धि तथा दुर्बुद्धि का अर्थ है दुष्ट बुद्धि या खराब बुद्धि। जब की अच्छाई-बुराई सापेक्ष और मानने पर अवलंबित होती है।इस प्रकार सद् बुद्धि और दुर्बुद्धि के वास्तविक अर्थ का ज्ञान न होने के कारण हम इन शब्दों का प्रयोग केवल स्थूल रुप में ही करते है। संत ज्ञानेश्वर महाराजने अपने द्वारा लिखे ग्रंथ ज्ञानेश्वरी के कुछ श्लोकों में सद् बुद्धि तथा दुर्बुद्धि के सूक्ष्म अर्थ पर दृष्टिपात किया हैजो वास्तव में बोधप्रद तथा मनन करने योग्य है। संत ज्ञानेश्वर ज्ञानेश्वरी में लिखते है--
                 दिये की ज्योति छोटी होती है किंतु उसका प्रभाव बहुत बडा होता है। उसी प्रकार सद् बुद्धि अल्प हो तो भी उसे अल्प नही कहना चाहिये ।वह अत्यंन्त सुखदायक होती है।
                  केवल शब्दों के आडंबर से अपने पाण्डित्य का प्रदर्शन करने वाले चिंतक इस जगत में बहुतेरे हैं किंतु उन्हें इस चराचर जगत के सत्य का ज्ञान कभी नहीं होता । वह दुष्प्राप्य है।
                पत्थर बहुतसे मिलेंगें किंतु पारस दुष्प्राप्य है । पारस या अमृत बिंदु बहुत अधिक पुण्य कर्म करने वाले को ही प्राप्त होता है।
                        उसी प्रकार सद् बुद्धि दुर्लभ है । संपूर्ण चराचर विश्व भगवन्मय है ऐसी बुद्धि ही सद् बुद्धि है । जिस प्रकार गंगा को सागर में मिलने से  कृतकृत्यता या सार्थकता प्राप्त होती है। उसी प्रकार बुद्धि को परमात्मा से एकात्म्य स्थापित करने से सार्थकता प्राप्त होती है।
                        हे अर्जुन, इस जगत में जिसे परमेश्वर से दूसरा कुछ भी नहीं दिखता वही सद् बुद्धि है। ईश्वर से अलग संसार को देखने वाली दुर्बुद्धि है। उसी के कारण राग- द्वेश , लोभ - मोह, आदि विकार उत्पन्न होते हैं और उसी में अविवेकी लोग सदैव लिप्त रहते हैं ।
                  इसीलिए हे अर्जुन , वे संसार में स्वर्ग- नर्क आदि काल्पनिक सुख - दुख रुपी जाल में फँसे रहते हैं । उन्हें आत्मसुख का दर्शन कभी नहीं होता।
                  उपर्युक्त अमृत बिंदुओं से स्पष्ट है कि  सद् बुद्धि का अर्थ है आत्मबुद्धि । वह  हितकारी होती है। आप पर भाव (द्वैत भाव) उत्पन्न करने वाली अनात्म बुद्धि (आत्मा से परे ) अर्थात वह दुर्बुद्धि है । उससे सदैव बचना चाहिए । अतः अब हम भी महाप्रभु से यही प्रार्थना करेंगें-
                                                                                  दुर्बुद्धि ना उपजे मेरे मानस हृदय पटल पर ।।
                                                                            इतना हो आलोक हमेशा जीवन के इस पथ पर ।।
                                                                                                       ------वासुदेव महाडकर। -----

Sunday, 10 September 2017

               पुराण काल की बात है लक्ष्मी रुठकर (अप्रसन्न होकर) पृथ्वी से वैकुंठ धाम को चलीगयी। जिसके कारण पृथ्वीपर अनेक समस्याए उत्पन्न हुई। वसिष्ठ ऋषि माता लक्ष्मी को पृथ्वी पर लाने का निश्चय कर वैकुण्ठ (विष्णु लोक) गये।  किंतु उन्हें सफलता नही मिली। उसके बाद वसिष्ठ ऋषि ने तपस्या शुरु की और भगवान विष्णु का आह्वाहन किया।  भगवान विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने वसिष्ठ ऋषि के साथ महा लक्ष्मी के प्रसाद (गृह) में प्रवेश किया।  वहां महा लक्ष्मी की प्रार्थना की।  किंतु माता लक्ष्मी ने पृथ्वी पर न जाने का अपना निश्चय दृढ रखा। वसिष्ठऋषि दुखी मन से पृथ्वी पर लौट आये और सभी के सामने एक बात का निवेदन किया, कि अब श्रीयंत्र निर्मिति के (शिवाय) बिना दूसरा कोई रास्ता बचा नहीं है। इसप्रकार उन्होंने अपने आश्रम में दीपावली के पूर्व धनत्रयोदशी के दिन विधि- विधान से श्रीयंत्र की प्राण प्रतिष्ठा की।  देवों के गुरु बृहस्पति जी ने वसिष्ठ ऋषि को श्रीयंत्र निर्मिति का ज्ञान एवं उसकी उपासना का क्रम बताया था। उन्हीं के निर्देशों के अनुसार श्रीयंत्र की निर्मिति हुई।  श्रीयंत्र की षोडशोपचार पूजा होते ही महा लक्ष्मी अपनी सभी सिद्धियों के साथ श्रीयंत्र रूपी सिंहासन पर प्रकट हुई.। महा लक्ष्मी ने सभी को आशिर्वाद दिया । उसने कहा कि -आप लोगो ने जो श्रीयंत्र का प्रयोग किया है उससे मै प्रभावित हुई हूँ, मै इस श्रीयंत्र में अखण्ड रुप में निवास करुंगी ।
         जिनके घर में विधि पूर्वक श्रीयंत्र की स्थापना हुई हो उन्हें सपरिवार श्रीयंत्र की आराधना भक्ति पूर्वक अंतःकरण से करनी चाहिए । सुबह स्नानादि से शुचिर्भूत होकर श्रीयंत्र के सामने नंदादीप (दीपक ) लगाकर आसन पर बैठना चाहिए। न्यास , संकल्प एवं ध्यान करके श्रीयंत्र की पंचोपचार पूजा करनी चाहिए। पूजा पूर्ण होने के बाद श्रीललिता सहस्रनाम स्तोत्र का पठन कर कुंकुमार्चन करना चाहिए। उसके बाद बीज मंत्र का जप करना चाहिए।  जप के बाद आरती एवं क्षमा प्रार्थना करनी चाहिए।  शाम को भी धूप-दीप प्रज्ज्वलित कर नैवैद्य(भोग) लगाना चाहिए। श्रीयंत्र को नित्य स्नान विधि , अभिषेक की आवश्यकता नहीं है.। केवल पौर्णिमा के दिन ललिता सहस्र नाम स्तोत्र से अभिषेक अथवा केवल जल से शुचिर्भूत होकर स्नान कराना चाहिए। ललिता सहस्रनाम स्तोत्र का पाठ एवं कुंकुमार्चन करना चाहिए। जिस घर में श्रीयंत्र की स्थापना एवं ललितासहस्रनाम स्तोत्र का पाठ तथा कुंकुमार्चन होता है उस घर में ललिता स्त्रिपुरसुंदरी का निश्चित ही निवास होता है इसे ध्यान में रखना चाहिए।
              श्रीयंत्र साधना से व्यापार वृद्धि , ऋण मोचन, संतान लाभ , दरिद्रता नाश, अपार धनसंपदा, भौतिक सुखसम्पदा, और अदभुत ऐश्वर्य सिद्धि प्राप्त होती है.। अत्यंत प्रभावी इस श्रीयंत्र के कारण घर में सुख समृद्धि रहती है ।सभी प्रकार के भय का नाश होता है। विद्या, शक्ति, यश , मान-सम्मान ,ऐश्वर्य और सकल समृद्धि प्राप्त होती है। श्रीयंत्र साधना संकटों से मुक्ती एवं यश समृद्धि की ओर जानेवाला राजमार्ग है। सुबह -शाम की पूजा में श्रीयंत्र पर किसी भी प्रकार के अभिषेक की आवश्यकता नहीं है-नित्य कुंकुमार्चन ही देवी का (श्रीयंत्र का) अभिषेक है।
            पिछले कुछ वर्षो से श्रीअशोक काका कुलकर्णि जानकारी पूर्ण लेख सोशल मिडिया पर पोस्ट करते आरहे है प्रस्तुत श्रीयंत्र की जानकारी उन्हीं की पोस्टसे हिंदी में अनुदित है- वासुदेव महाडकर  
             





  


























































































































































































































Sunday, 20 August 2017

*   सुभाषित--
                            अनारम्भो हि कार्याणां प्रथम बुद्धिलक्षणम्  ।
                             आरब्धस्यान्तगमनं द्वितीयं  बुद्दिलक्षणम्  ।।
   किसी भी कार्य का प्रारंभ ही न करना बुद्धिका प्रथम लक्षण है, (किन्तु ) प्रारंभ कर ही  दिया तो उसे अंत तक लेजाना (पूर्ण करना ) बुद्धिका दूसरा लक्षण है ।




Thursday, 13 July 2017

एको देवः सर्वभूतेषु गूढःसर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । 
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ।।
एकही ईश्वर सभीप्राणियों में छुपा हुआ है।  सर्वव्यापि और सभी प्राणियों में अंतर्यामि परमात्मा है ।
वही सभी कर्मका अधिष्ठाता, सभी भूतोंका निवास स्थान, सभीका साक्षी, चेतनस्वरुप , सम्पूर्णरुपसे विशुद्ध
एवं गुणातीत है।।

Monday, 17 April 2017

पिछले दिनों एक फ्रेंड रिक्वेस्ट ने मुझे इस गज़ल की याद दिलायी और पोस्ट करने को प्रेरित किया, क्योंकि उसमे मित्रता और रिश्ते का मेल था, जबकि ये दोनों अलग -अलग हैं। हर रिश्तेको किसी न  किसी नामकी जरुरत पड़ती ही है किन्तु मित्रता को किसी नाम की जरुरत ही नहीं है। संक्षिप्त में कहूँ तो एक मूर्त रूप से अमूर्त हो जाता है तो दूसरा अमूर्त में मूर्त रूप को देखता है। 
यद्यपि यह गज़ल मेरी लिखी नहीं है। यह ८० के दशक में यूनियन बैंक वाराणसी की पत्रिका में छपी थी ,,,,,,जो मेरी पढ़ी हुई है ------
तुम्हारी शपथ मै तुम्हारा नहीं हूँ 
भटकती लहर का किनारा नहींहूँ। 
तुम्हारा ही क्यों, मै किसी का नहीं हूँ 
रहेगा ग़म अंततक इसीका 
किया एक अपराध मैंने जगत का 
न था जिसका हुआ मै उसीका 
आगेकी तो मै नहीं जानता हूँ 
अभी तक मै किसीका प्यारा नहीं हूँ 
तुम्हारी शपथ मै तुम्हारा नहीं हूँ ,,,| 

किसीको कुछ न देसकी चाह मेरी 
प्रलय भी न लेसकी थाह मेरी 
किसीके चरण - चिन्ह मैंने न खोजे 
जिधर पैर पड़ गये बन गयी राह मेरी 
न जाने कहांसे कहां पहुँच गया हूँ 
निश्चित पथिक हूँ ,सहारा नहीं हूँ 
तुम्हारी शपथ मै तुम्हारा नहीं हूँ ,,,,,
भटकती लहर का किनारा नहीं हूँ।।